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आदि पर्व
अध्याय ४७
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सूत उवाच
ततः कर्म प्रववृते सर्पसत्रे विधानतः |  १७   क
पर्यक्रामंश्च विधिवत्स्वे स्वे कर्मणि याजकाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति