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आदि पर्व
अध्याय ४७
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सूत उवाच
अपि तत्कर्म विदितं भवतां येन पन्नगम् |  ४   क
तक्षकं सम्प्रदीप्तेऽग्नौ प्राप्स्येऽहं सहवान्धवम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति