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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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जनमेजय़ उवाच
शरतल्पे शय़ानस्तु भरतानां पितामहः |  १   क
कथमुत्सृष्टवान्देहं कं च योगमधारय़त् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति