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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
सा सुखं प्रतिपद्यस्व दासो भीरु भवामि ते |  १०   क
अह्नाय़ तव सुश्रोणि शतं निष्कान्ददाम्यहम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति