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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
शुचिः शुचिषदं हंसं तत्परः परमेष्ठिनम् |  ११   क
युक्त्वा सर्वात्मनात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति