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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्त्वस्थं सात्वतां पतिम् |  १७   क
यं दिव्यैर्देवमर्चन्ति गुह्यैः परमनामभिः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति