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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
अतिवाय़्विन्द्रकर्माणमतिसूर्याग्नितेजसम् |  २१   क
अतिवुद्धीन्द्रिय़ात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति