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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
पुत्रदारैः सुखैश्चैव विय़ुक्तस्य धनेन च |  ३   क
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे धृतिः श्रेय़स्करी नृप ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति