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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तमात्रे त्वय़न उत्तरे वै दिवाकरे |  ३   क
समावेशय़दात्मानमात्मन्येव समाहितः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति