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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यं दृगात्मानमात्मस्थं वृतं षोडशभिर्गुणैः |  ३४   क
प्राहुः सप्तदशं साङ्ख्यास्तस्मै साङ्ख्यात्मने नमः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति