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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसन्धिषु |  ४१   क
कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोय़ात्मने नमः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति