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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रं कृत्स्नमूरूदरं विशः |  ४३   क
पादौ यस्याश्रिताः शूद्रास्तस्मै वर्णात्मने नमः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति