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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्नपानेन्धनमय़ो रसप्राणविवर्धनः |  ४६   क
यो धारय़ति भूतानि तस्मै प्राणात्मने नमः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति