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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यो मोहय़ति भूतानि स्नेहरागानुवन्धनैः |  ४८   क
सर्गस्य रक्षणार्थाय़ तस्मै मोहात्मने नमः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति