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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन्विश्वसम्भव |  ५५   क
अपवर्गोऽसि भूतानां पञ्चानां परतः स्थितः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति