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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु |  ५६   क
नमस्ते दिक्षु सर्वासु त्वं हि सर्वपराय़णम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति