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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
नमस्ते भगवन्विष्णो लोकानां प्रभवाप्यय |  ५७   क
त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति