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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
तेन पश्यामि ते दिव्यान्भावान्हि त्रिषु वर्त्मसु |  ५८   क
तच्च पश्यामि तत्त्वेन यत्ते रूपं सनातनम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति