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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुन्धरा |  ५९   क
विक्रमेण त्रय़ो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति