शान्ति पर्व  अध्याय ४७

वैशम्पाय़न उवाच

त्वां प्रपन्नाय़ भक्ताय़ गतिमिष्टां जिगीषवे |  ६२   क
यच्छ्रेय़ः पुण्डरीकाक्ष तद्ध्याय़स्व सुरोत्तम ||  ६२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति