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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्य तु योगेन भक्तिं भीष्मस्य माधवः |  ६५   क
त्रैकाल्यदर्शनं ज्ञानं दिव्यं दातुं यय़ौ हरिः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति