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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो गिरः पुरुषवरस्तवान्विता; द्विजेरिताः पथि सुमनाः स शुश्रुवे |  ७२   क
कृताञ्जलिं प्रणतमथापरं जनं; स केशिहा मुदितमनाभ्यनन्दत ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति