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अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
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युधिष्ठिर उवाच
चतस्रो विहिता भार्या व्राह्मणस्य पितामह |  ४   क
व्राह्मणी क्षत्रिय़ा वैश्या शूद्रा च रतिमिच्छतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति