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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् |  १९   क
इष्ट्वानन्त्याय़ गोविन्दं पश्यत्यात्मन्यवस्थितम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति