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वन पर्व
अध्याय २७७
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतेन निय़मेनासीद्वर्षाण्यष्टादशैव तु |  १०   क
पूर्णे त्वष्टादशे वर्षे सावित्री तुष्टिमभ्यगात् |  १०   ख
स्वरूपिणी तदा राजन्दर्शय़ामास तं नृपम् ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति