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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
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व्रह्मो उवाच
तपसा क्षेममध्वानं गच्छन्ति परमैषिणः |  ४   क
संन्यासनिरता नित्यं ये व्रह्मविदुषो जनाः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति