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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स पृथिवीपालः पाण्डवानां धुरन्धरः |  १०   क
निर्ययौ सह सोदर्यैः सदारो भरतर्षभ ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति