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वन पर्व
अध्याय ६९
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वृहदश्व उवाच
एवं विचार्य वहुशो वार्ष्णेय़ः पर्यचिन्तय़त् |  ३२   क
हृदय़ेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथिः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति