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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्च पृथाय़ाश्च विधिवन्नामगोत्रतः |  १३   क
शौचं निवर्तय़न्तस्ते तत्रोषुर्नगराद्वहिः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति