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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रेषय़ामास स नरान्विधिज्ञानाप्तकारिणः |  १४   क
गङ्गाद्वारं कुरुश्रेष्ठो यत्र दग्धोऽभवन्नृपः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति