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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रैव तेषां कुल्यानि गङ्गाद्वारेऽन्वशात्तदा |  १५   क
कर्तव्यानीति पुरुषान्दत्तदेय़ान्महीपतिः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति