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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रं समुद्दिश्य ददौ स पृथिवीपतिः |  १७   क
सुवर्णं रजतं गाश्च शय़्याश्च सुमहाधनाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति