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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
गान्धार्याश्चैव तेजस्वी पृथाय़ाश्च पृथक्पृथक् |  १८   क
सङ्कीर्त्य नामनी राजा ददौ दानमनुत्तमम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति