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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यो यदिच्छति यावच्च तावत्स लभते द्विजः |  १९   क
शय़नं भोजनं यानं मणिरत्नमथो धनम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति