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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ते चापि राजवचनात्पुरुषा ये गताभवन् |  २२   क
सङ्कल्प्य तेषां कुल्यानि पुनः प्रत्यागमंस्ततः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति