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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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नारद उवाच
स विवृद्धस्तदा वह्निर्वने तस्मिन्नभूत्किल |  ४   क
तेन तद्वनमादीप्तमिति मे तापसाव्रुवन् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति