आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४७

नारद उवाच

गुरुशुश्रूषय़ा चैव जननी तव पाण्डव |  ८   क
प्राप्ता सुमहतीं सिद्धिमिति मे नात्र संशय़ः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति