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सभा पर्व
अध्याय ४७
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दुर्योधन उवाच
अजाविकं गोहिरण्यं खरोष्ट्रं फलजं मधु |  ११   क
कम्वलान्विविधांश्चैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति