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वन पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी नृणाम् |  ३४   क
अधर्मवहुला चैव घोरा पापानुवन्धिनी ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति