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वन पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र कश्चिद्दुर्वर्णो व्याधितो वाप्यदृश्यत |  ८   क
कृशो वा दुर्वलो वापि दीनो भीतोऽपि वा नरः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति