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विराट पर्व
अध्याय ४७
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भीष्म उवाच
प्रतिय़ुध्याम समरे सर्वशस्त्रभृतां वरम् |  ११   क
तस्माद्यदत्र कल्याणं लोके सद्भिरनुष्ठितम् |  ११   ख
तत्संविधीय़तां क्षिप्रं मा नो ह्यर्थोऽतिगात्परान् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति