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विराट पर्व
अध्याय ४७
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भीष्म उवाच
सम्प्रवृत्ते तु सङ्ग्रामे भावाभावौ जय़ाजय़ौ |  १३   क
अवश्यमेकं स्पृशतो दृष्टमेतदसंशय़म् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति