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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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धृतराष्ट्र उवाच
पृच्छामि त्वां सञ्जय़ राजमध्ये; किमव्रवीद्वाक्यमदीनसत्त्वः |  १   क
धनञ्जय़स्तात युधां प्रणेता; दुरात्मनां जीवितच्छिन्महात्मा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति