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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
समाददानः पृथगस्त्रमार्गा; न्यथाग्निरिद्धो गहनं निदाघे |  १००   क
स्थूणाकर्णं पाशुपतं च घोरं; तथा व्रह्मास्त्रं यच्च शक्रो विवेद ||  १००   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति