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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
नित्यं पुनः सचिवैर्यैरवोच; द्देवानपीन्द्रप्रमुखान्सहाय़ान् |  १०२   क
तैर्मन्यते कलहं सम्प्रय़ुज्य; स धार्तराष्ट्रः पश्यत मोहमस्य ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति