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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
माय़ोपधः प्रणिधानार्जवाभ्यां; तपोदमाभ्यां धर्मगुप्त्या वलेन |  ११   क
सत्यं व्रुवन्प्रीतिय़ुक्त्यानृतेन; तितिक्षमाणः क्लिश्यमानोऽतिवेलम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति