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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
सुखोचितो दुःखशय़्यां वनेषु; दीर्घं कालं नकुलो यामशेत |  २१   क
आशीविषः क्रुद्ध इव श्वसन्भृशं; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति