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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
यदा गतोद्वाहमकूजनाक्षं; सुवर्णतारं रथमातताय़ी |  २४   क
दान्तैर्युक्तं सहदेवोऽधिरूढः; शिरांसि राज्ञां क्षेप्स्यते मार्गणौघैः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति