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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
लोकालोकविनाशे च प्रादुर्भूते तदानघ |  १३   क
उपतस्थुर्महात्मानं सर्वलोकपितामहम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति