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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
व्रूय़ाच्च मा प्रवृणीष्वेति लोके; युद्धेऽद्वितीय़ं सचिवं रथस्थम् |  ४०   क
शिनेर्नप्तारं प्रवृणीम सात्यकिं; महावलं वीतभय़ं कृतास्त्रम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति